Thursday, May 31, 2018

‘पथ के साथी’ में स्मृति का सृजनात्मक उपयोग


पथ के साथीमें स्मृति का सृजनात्मक उपयोग
                                              
                                                 ज्ञानेंद्र प्रताप सिंह 
शोधार्थी -हिंदी विभाग ,दिल्ली विश्वविद्यालय
पता – सी -195-196 द्वितीय तल, गाँधी विहार दिल्ली
पिन न. 110009मो. न.- 8882898773

Email : gyanendra0793@gmail.com



          रेखाचित्र हिन्दी गद्य साहित्य की नवीनतम विधाओं में से एक है, जिसमें किसी देखे-सुने अनुभव के आधार पर वास्तविक जीवन की चारित्रिक विशेषताओं का मर्मस्पर्शी चित्रण होता है। जैसाकि नाम से ही स्पष्ट है रेखाचित्र कला का शब्द है रेखाएँ ही इसमें चित्र अंकन का मुख्य आधार होती हैं।
          रेखाचित्रअंग्रेजी शब्द स्केचका पर्याय है, जिसे हिन्दी में शब्दचित्र कहते हैं। जो चित्र रेखाओं द्वारा खीचें जाते हैं, वे रेखाचित्र कहलाते हैं। चित्रकार स्केच खीचते समय रेखाओं का सहारा लेता है, रंग उतने आवश्यक नहीं समझे जाते। लेकिन जब साहित्यकार किसी वस्तु, व्यक्ति या घटना का चित्र खीचता है, तब वह शब्दों से काम लेता है। चित्रकार की रेखाओं के स्थल पर शब्द ही उसके काम आते हैं इस बात को हिन्दी के प्रमुख आलोचक शिवदान सिंह चौहान ने इस प्रकार स्पष्ट किया है- ‘‘रेखाचित्र पढ़कर किसी वस्तु का चित्र ही हमारे सामने नहीं खिंच जाता, बल्कि अभिव्यक्ति और चित्रण के पीछे अनासक्तिभाव का उपक्रम किए लेखक की छिपी सहानुभूति से भी अप्रत्यक्ष रूप से पाठक प्रभावित होता है, वास्तविकता के उस टुकड़े को उस विराट संदर्भ से हटाकर जैसे आन्तरिक नेत्र से देखकर वह उसे पूरे तौर पर जान लेता है और उसके संपूर्ण स्वरूप से उसके आंतरिक संबंधों को पहचान लेता है।’’1 इससे स्पष्ट है कि रेखाचित्र या शब्दचित्र खींचना सरल कार्य नहीं है।
          हिन्दी साहित्य के इतिहास के ‘‘छायावादोत्तर काल में रेखाचित्र साहित्य के विकास की दिशा में हंस पत्रिका का रेखाचित्र-विशेषांकसर्वप्रथम उल्लेखनीय है, क्योंकि इसमें हिन्दी के अतिरिक्त अन्य भारतीय भाषाओं के लेखकों के भी रेखाचित्र प्रकाशित किए गए थे। इन विधाओं के हिन्दी लेखकों में बनारसीदास चतुर्वेदी का स्थान सर्वोच्च है। 'हमारे आराध्य', ‘संस्मरण’, ‘रेखाचित्रतथा सेतुबंधउनकी अनुपम कृतियाँ हैं। श्री राम शर्मा-कृत प्राणों का सौदा’, ‘जंगल के जीवऔर वे जीते कैसे हैंउल्लेखनीय रचनाएँ है। रामवृक्ष बेनीपुरी ने यथार्थ के साथ कल्पना और भावुकता का समन्वय कर लाल तारा’, ‘माटी की मूरतें’, ‘गेहूँ और गुलाबतथा मील के पत्थरशीर्षक कृतियाँ लिखी हैं। हिन्दी के रेखाचित्र-साहित्य की अभिवृद्धि में महादेवी वर्मा का महत्वपूर्ण योगदान है। अतीत के चलचित्र’, ‘स्मति की रेखाएँ’, ‘पथ के साथीऔर स्मारिकाउनके अन्यतम रेखाचित्र संग्रह है। इनमें नारी हृदय की आत्मीयता तथा सरलता मिलती है।’’2
          महादेवी वर्मा का प्रथम रेखाचित संग्रह अतीत के चलचित्रसन् 1941 ई. में प्रकाशित हुआ। इसके पश्चात् इनके दो रेखाचित्र संग्रह स्मृति की रेखाएँऔर पथ के साथी’ (1956 ई. में) प्रकाशित हुआ। अतीत के चलचित्र' में प्रथम बार सफल रेखाचित्र के दर्शन हुए, कुछ विद्वान इसे ही हिन्दी का प्रथम सफल रेखाचित्र मानते हैं। इन रेखाचित्रों में स्थान-स्थान पर महादेवी जी के व्यक्तित्व के दर्शन भी होते हैं। इनके पात्रों में स्वच्छन्द मानवता के उन प्रकाश उज्जवल रूपों के दर्शन होते हैं जो समाज की सड़ी- गली रूढ़ियों के विरुद्ध निरन्तर संघर्ष करते हुए पाठक की सहानुभूति तथा स्नेह को पाने में समर्थ होते हैं। महादेवी वर्मा ने अपनी भावनाओं को शब्दों और रेखाओं, दोनों के माध्यम से अभिव्यक्ति दी है। एक सशक्त कवयित्री, एक अच्छी निबन्धकार होने के साथ-साथ वे रेखाचित्र अंकन की कला में प्रवीण थी । साहित्य में इन रेखाचित्र की विशिष्टता का एक और भी कारण है। वह कि इन रेखाचित्रों के पात्र महादेवी की जीवन कथा को छूने वाले अंग है, जिस सम्बन्ध में डॉ. नागेन्द्र का मत स्पष्ट है- ‘‘महादेवी के रेखाचित्रों में संवेदनशीलता, भावुक कल्पना, कविहृदय और कलात्मक अभिव्यक्ति का अभूतपूर्ण उत्कर्ष मिलता है।’’3
          पथ के साथीमें महादेवी वर्मा ने अपने समकालीन साहित्यकारों के जीवन दर्शन को अपने रेखाचित्र का विषय बनाया है, जिसमें कवीन्द्र रवीन्द्रनाथ ठाकुर, मैथिलीशरण गुप्त, सुभद्रा कुमारी चौहान, सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला’, जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानन्दन पंत तथा सियारामशरण गुप्त जी है। इस संग्रह के पात्रों का सम्बन्ध समाज के शिक्षित वर्ग से है, परन्तु इनमें से अधिकांश धनाभाव से पीड़ित है, अतः स्वयं अभावग्रस्त होने के कारण दूसरे का दुःख अनुभव करने में समर्थ है। निराला की जीवनधारा से सम्बन्धित रेखाचित्र इसका सुन्दर उदाहरण है। लेकिन साहित्यकारों को साहित्य का विषय बनाना सरल भी है और दुष्कर भी। यह समझने के लिए महादेवी वर्मा की पथ के साथीके भूमिका की ये पक्तियाँ स्पष्ट है- ‘‘साहित्यकार की साहित्य-सृष्टि का मूल्यांकन तो अनेक आगत-अनागत युगों में हो सकता है, परन्तु उसके जीवन की कसौटी उसका अपना युग ही रहेगा।’’4
          महादेवी का पथ के साथीको पढ़ने से यह स्पष्ट हो जाता है, कि यह मित्र-संवाद ही न होकर जीवन को प्रभावित करने वाले प्ररेणा-स्त्रोत से युक्त है इससे हमें जीवन जीने की कला का ज्ञान होता है क्योंकि इसमें व्यक्ति के कृतित्व और व्यक्तित्व का वह बिंब प्रस्तुत किया गया है, जिसे महादेवी ने अपनी प्रज्ञा की आँखो से देखा। इसके सम्बन्ध में कृष्णदत्त पालीवाल का यह कथन सार्थक है- ‘‘महादेवी के ये संस्मरण इतने प्रसिद्ध हुए हैं कि अज्ञेय जैसे रचनाकार को स्मृति लेखाकी ओर मुड़ना पड़ा।’’5
          प्रणामशीर्षक से प्रारम्भ होने वाला कवीन्द्र रवीन्द्रबाबू का चित्र सूक्ष्मतर से सूक्ष्मतर और फिर स्थूलता की ओर अग्रसर होता है । लेखिका सामान्य कथन के लिए प्राकृतिक दृश्यों का आधार ग्रहण करती हैं और रवीन्द्रनाथ ठाकुर की विशेषता को सामने लाती है और रवीन्द्र के तीन विभिन्न परिवेशों में देखने के चित्रण महादेवी जी करती हैं। पथ के साथीमें कवीन्द्र-रवीन्द्र के बाह्मरूप का शब्दों द्वारा किया हुआ चित्रण दृष्टव्य है- ‘‘मुख की सौम्यता को घेरे हुए वह रजत आलोक-मण्डल जैसा केश कलाप। मानो समय ने ज्ञान को अनुभव के उजाले झीने तन्तु में काट कर उससे जीवन का मुकुट बना दिया है। केशों की उज्ज्वलता के लिए दीप्त दर्पण जैसे माथे पर समानान्तर रहकर साथ चलने वाली रेखाएँ जैसे लक्ष्य-पथ पर हृदय के विश्राम चिन्ह हो।’’6
          महादेवी की सर्जनात्मकता रवीन्द्रनाथ पर लिखा गया प्रणाममें स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है जिसमें स्मृति का सजग अंकन है तथा जिसके सम्बन्ध में कृष्णदत्त पालीवाल लिखते हैं- ‘‘रवींद्रनाथ के महाप्राण पर लिखा गया महादेवी का यह प्रणामस्मरण इतना प्रभावी सर्जनात्मक है कि हिन्दी का गद्य इस संपन्न सामर्थ्य से फूला नहीं समाता है। पूरा संस्मरण बिंब बहुल भाषा का उज्ज्वल नीलमणि से निर्मित लोक ही है।’’7
          इस संग्रह का दूसरा संस्मरण मैथिलीशरण गुप्त जी पर है जिनकी अहोकहोतुकबन्दी पर मुग्ध महादेवी ने अपनी स्मृति का प्रमाण दिया है । गुप्त जी के प्रति महादेवी की गहरी आस्था थी, जिसका उल्लेख इन पंक्तियों से मिलता है- ‘‘मैं गुप्त जी को कब से जानती हूँ, इस सीधे से प्रश्न का मुझसे आज तक कोई सीधा-सा उत्तर नहीं बन पड़ा। प्रश्न के साथ ही मेरी स्मृति अतीत के एक धूमिल पृष्ठ पर उगुंली रख देती है जिस पर न वर्ष, तिथि आदि की रेखाएँ हैं और न परिस्थितियों के रंग। केवल कवि बनने के प्रयास में बेसुध एक बालिका का छायाचित्र उभर आता है।’’8 इन पक्तियों से महादेवी की स्मृति का स्पष्ट प्रमाण मिलता है जो उनकी स्मृति सृजन में उपयोगी सिद्ध हुई है।
          इसी प्रकार महादेवी जी ने बहन सुभद्रा कुमारी को उनके कवि रूप में देखने से पूर्व सहज सख्य भाव से अपनी सम्पूर्ण संवेदनशीलता के साथ अपना लिया था जिस कारण यह रेखाचित्र अत्यंत जीवन्त प्रतीत होता है- ‘‘एक सातवीं कक्षा की विद्यार्थिनी, एक पाँचवी कक्षा की विद्यार्थिनी से प्रश्न करती है, ‘क्या तुम कविता लिखती हो? दूसरी ने सिर हिलाकर ऐसी अस्वीकृति दी जिसमें 'हाँ' और 'नहीं' तरल होकर एक हो गये थे। प्रश्न करने वाली ने इस स्वीकृति-अस्वीकृति की सन्धि से खीझ कर कहा, ‘तुम्हारी क्लास की लड़कियाँ तो कहती है कि तुम गणित की कापी तक में कविता लिखती हो। दिखाओ अपनी कापी और उत्तर की प्रतीक्षा में समय नष्ट न कर कविता लिखने की अपराधिनी को हाथ पकड़कर खींचती हुई उसके कमरे में डेस्क के पास ले गई। नित्य व्यवहार में आने वाली गणित की कापी छिपाना सम्भव न था, अतः उसके साथ अंकों के बीच में अनाधिकार सिकुड़ कर बैठी हुई तुकबन्दियाँ अनायास पकड़ में आ गई।’’9 इसके बाद का यह चित्रण और मार्मिक है- ‘‘तुमने सबसे क्यों बताया? ‘का सहारा उत्तर थाहमें भी तो यह सहना पड़ता है। अच्छा हुआ अब दो साथी हो गए। कितनी स्वाभाविकता है दो बालिकाओं के संवाद में, बाल सुलभ विशेषताएँ उभर गई हैं। इसमें महादेवी वर्मा की स्मृति उच्च शिखरों को छूती नजर आ रही है।
          सूर्यकान्त त्रिपाठी निरालाके रेखाचित्र में महादेवी वर्मा की आत्मा रमी है वे उन्हें राखीबन्द भाई बनाने से लेकर उनके पारिवारिक, निजी तथा कलात्मक रूपों तक की मर्मोद्घारिनी झाँकी देती चलती हैं ‘‘उस दिन मैं बिना कुछ सोचे हुए ही भाई निरालाजी से पूँछ बैठी थी।’’ आपके किसी ने राखी नहीं बाँधी... पर अपने प्रश्न के उत्तर ने मुझे क्षण भर के लिए चौका दिया! कौन बहिन हम ऐसे भुक्खड़ को भाई बनावेगी।’’10 इसी प्रकार जिस दिन मैथिलीशरण गुप्त निराला जी के अतिथि बने, उस दृश्य को भुला पाना स्वाभाविक नहीं है- ‘‘बगल में गुप्त जी के बिछौने का बंडल दवाए, दियासलाई के क्षण-प्रकाश क्षण-अन्धकार में तंग सीढ़ियों का मार्ग दिखाते हुए निराला जी हमें उस कक्ष में ले गए जो उनकी कठोर साहित्य-साधना का मूल साक्षी रहा है। आले पर कपड़े की आधी जली बत्ती से भरा, पर तेल से खाली मिट्टी का दिया मानों अपने नाम की सार्थकता के लिए जल उठने का प्रयास कर रहा था।’’11 इस संस्मरण में महादेवी के स्मृति की छाप का सर्वोत्कृष्ट रूप चित्रित हुआ है।
          प्रसाद जी का चित्र निराला की तरह न इतनी आत्मीयता पा सका है और न अपनी विविधता में ही मुखरित हो पाया है, फिर भी महादेवी वर्मा की स्मृति की छाप इन पंक्ति से चलती है- ‘‘मेरी हँसी देखकर या मुझे भारी भरकम नाम के विपरीत देख प्रसाद जी ने निश्चय हँसी के साथ कहा- आप तो महादेवी जी जान पड़ती। मैंने भी वैसे ही प्रश्न में उत्तर दिया- आप ही कहाँ कवि प्रसाद लगते है जो चित्र में बौद्ध भिक्षु जैसे हैं।’’12 यह उदाहरण महादेवी की स्मृति की सर्जनात्मक उपयोग को सिद्ध करता है।
          सुमित्रानन्दन पंत के प्रति अपनी परिचयशीलता की स्वीकृति के साथ महादेवी वर्मा ने एक मनोरंजक प्रसंग द्वारा उसके आरम्भ की बात उठाई है। महादेवी वर्मा की ये पक्तियाँ स्पष्ट है- ‘‘जब वे तीसरी कक्षा के बाल-विद्यार्थी थे, तभी उन्हें अपने गोसाईदत्त नाम की कवित्वहीनता अखरने लगी। सुमित्रानन्दन जैसा श्रुति-मधुर नाम अपने लिए खोज लेने वाली उनकी असाधारण बुद्धि ने जीवन और साहित्य के अनेक क्षेत्रों में अपनी सृजनशीलता का परिचय दिया है।’’13
          इसी प्रकार सियारामशरण गुप्त के रेखाचित्र भी है, जो संक्षिप्त होकर भी गहरी छाप छोड़ते हैं- ‘‘कुछ नाटा कद, दुर्बल शरीर और कृश हाथ-पैर, लम्बे उलझे रूखे से बाल, लम्बाई लिए सूखे मुख, ओंठ और विशेष तरल आँखों के साथ भाई शियारामशरण ऐसे लगते हैं मानो ठेठ भारतीय मिट्टी की बनी पकी कोई मूर्ति हो, जिसकी आँखों पर स्निग्धता का गाढ़ा रंग फेर कर शिल्पी, शेष अंगों पर फेरना भूल गया है।’’14
          महादेवी वर्मा के पथ के साथीके सन्दर्भ में यह कथन उल्लेखनीय है- ‘‘जहाँ-जहाँ उनके निरीक्षण में निकट परिचय संवाद और हार्दिकता है वहाँ वे बहुत सर्जनात्मक वृत्त रचती है। इस दृष्टि से निराला और सुभद्रा कुमारी चौहान का संस्मरण जितना बेजोड़ है, जयशंकर प्रसाद तथा शियारामशरण गुप्त का उतना ही कमजोर है।’’15
          निष्कर्षतः महादेवी वर्मा के पथ के साथीही नहीं उच्च रेखाचित्रोंस्मृति की रेखाएँएवं अतीत के चलचित्रको देखा जाए तो लगता है कि उनकी कला पर किसी अन्य का प्रभाव नहीं है। महादेवी की अपनी मौलिक प्रतिभा एवं सृजनशीलता ही इनकी रचनाओं में सर्वत्र प्रकट होती है। इसी कारण कहीं-कहीं तो महादेवी जी के रेखाचित्र कविता से भी अधिक हृदय ग्राही बन गए है। पथ के साथीके सभी चित्र यथार्थ  की कठोर भूमि पर टिके रहकर सृजन की ऊचाईयों का स्पर्श करने में समर्थ हैं, क्योंकि उनमें भावना, बुद्धि, कल्पना एवं विशिष्ट शैली का अद्भुत समन्वय है, जिससे सिद्ध होता है कि पथ के साथीस्मृति के सर्जनात्मक उपयोग से परिपूर्ण है।
संदर्भ सूची
1.      ‘‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’’- हृदयेश मिश्र एवं शिवलोचन पाण्डेय, पृष्ठ 279, प्रकाशक- भारती भवन, पटना, 2003
2.      उपरोक्त, पृष्ठ सं. 279-280
3.      ‘‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’’- सं. डॉ. नगेन्द्र, पृष्ठ सं. 581, प्रकाशक-मयूर पेपर बैक्स, दिल्ली, संस्करणः 2012
4.      ‘‘पथ के साथी’’- महादेवी वर्मा, पृष्ठ सं. 5, प्रकाशक-लोकभारती पेपर बैक्स, इलाहाबाद, सं. 2011
5.      ‘‘नवजागरण और महादेवी वर्मा का रचना-कर्मः स्त्री विमर्श के स्वर’’- कृष्णदत्त पालीवाल, प्रकाशक-किताब घर, प्रथम सं. 2008, पृष्ठ सं. 305
6.      पथ के साथी’- महादेवी वर्मा, पृष्ठ सं. 11
7.      ‘‘नवजागरण और महादेवी वर्मा का रचना कर्मः स्त्री विमर्श के स्वर’’- कृष्णदत्त पालीवाल, पृष्ठ सं. 313
8.      पथ के साथी’- महादेवी वर्मा, पृष्ठ सं. 23
9.      उपरोक्त, पृष्ठ सं. 39
10.    उपरोक्त, पृष्ठ सं. 51
11.    उपरोक्त, पृष्ठ सं. 52-53
12.    उपरोक्त, पृष्ठ सं. 67
13.    उपरोक्त, पृष्ठ सं. 79
14.    उपरोक्त, पृष्ठ सं. 85
15.    ‘‘लेखिकाओं की दृष्टि में महादेवी वर्मा’’- सं. चन्द्रा सदायत प्रकाशक- नेशनल बुक ट्रस्ट, इण्डिया, 2011, पृष्ठ सं. 80



              जनकृति [ बहुभाषी अन्तर्राष्ट्रीय मासिक पत्रिका ] में प्रकाशित , ISSN :2454-2725, Impact Factor : GIF 2.0202 VOL.3, Issue 34-35 फरवरी - मार्च अंक 2018




#चाहत #

                   #चाहत #


अगर तुम कुछ बनना चाहते हो  
तो न उसके लिये बहुत देर होती है
और न मेरे मामले में बहुत जल्दी ।
इसमें वक़्त की कोई पाबंदी नहीँ होती
जिस उम्र में चाहो शुरू कर सकते हो तुम,
बदल सकते हो या वही रह सकते हो।
सपने पूरा करने के लिये कोई नियम नहीँ हैं ।
हम हालात को बेहतर से बेहतर ,
बद्तर से बद्तर बना सकते हैं ।
मुझे यकीन है उसे बेहतर बनाओगे तुम,
मुझे उम्मीद है कि तुम ऐसी चीजों को देखोगे जो तुम्हें चौंका देंगी ।
मुझे उम्मीद है जज्बातों को वैसे महसूस करोगे जैसे तुमने कभी नहीँ किया होगा ।
मुझे उम्मीद है कि लोगों से अलग ही नजरिए से मिलोगे तुम ।
मुझे उम्मीद है कि तुम वो जिंदगी जीओगे जिस पर नाज़ होगा तुम्हें ,
और अगर लगे कि ये वैसी जिंदगी नहीँ है
तो उम्मीद करता हूँ तुममे एक नयी जिंदगी शुरू करने की हिम्मत होगी।

© - ज्ञानेन्द्र प्रताप सिंह (01/01/2017)

Friday, May 25, 2018

*बेचैन संतुलन*

       *बेचैन संतुलन*

प्रेम का अतियथार्थवाद वह है ,
जो बरबस जीवन में फूट पड़ता है ।
लेकिन जीवन इसका कायल नहीं है...
एक तरफ अपने को वायवी बनाकर असंभव - सी लगने वाली ऊँचाई को छू लेने का अदम्य उत्साह है ,
दूसरी तरफ अपने को पत्थर की तरह ठोस बनाकर उमड़ती हुई वायवीयता को दबा देने की कोशिश ।
इन दोनों हाशियों के बीच प्रेम एक व्याकुल शांति की तरह स्थिर है ।
मूलतः वह ,
 जिसे हम प्रेम कहते हैं ,
दो अतियों अथवा सीमांतों के बीच गति और प्रतिगति का एक झीना , झिलमिलाता हुआ
बेचैन संतुलन है ।
लेकिन इस बेचैनी का अपना ही मजा है ...

© ज्ञानेंद्र प्रताप सिंह

Monday, March 5, 2018

आधे-अधूरे : एक यर्थाथवादी रंगशिल्प

आधे-अधूरे : एक यर्थाथवादी रंगशिल्प


          19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में गद्य का अविर्भाव भारतीय नवजागरण की एक महत्वपूर्ण विशेषता है, अपने प्रारम्भिक दौर में गद्य की विधाओं यथा- निबन्ध, उपन्यास, नाटक में सबसे ज्यादा जोर नाट्य लेखन पर दिखाई देता है, नाटक महज पाठ्य विधा नहीं है अपितु दृश्य विधा भी है । अपने दृश्यात्मकता के कारण ही यह गद्य की अन्य विधाओं से अलग है।
          हिन्दी साहित्य में नाटक की परंपरा का विकास भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के नाटकों से होता है बीसवीं शताब्दी तक आते-आते रंगमंच के क्षेत्र में पर्याप्त विकास होने से नाटक गद्य की एक लोकप्रिय विधा बन गई, इसे विशिष्ट बनाने के लिए महान कलाकारों एवं रचनाकारों ने काम किया। नाटक की परम्परा भारतेन्दु युग से होते हुए प्रसाद युग एवं प्रसादोत्तरयुगीन नाटकों से होते हुए स्वातन्त्रोत्तर हिन्दी नाटक की ओर बढ़ती है इसी स्वातन्त्रोत्तर नाटककारों में मोहन राकेश का नाम लिया जाता है, जिन्होंने अपने लेखन से हिन्दी नाटक की ऊँचाईयों को पार कर लिया, जिसके सम्बन्ध में 'हृदयेश मिश्र' एवं 'शिवलोचन पाण्डेय' अपनी पुस्तक में लिखते हैं कि- ‘‘मोहन राकेश ने अपने तीन नाटकों द्वारा हिन्दी नाटक की बुलंदियों को छू लिया है। इनके आषाढ़ का एक दिन’, ‘लहरों के राजहंसऔर आधे-अधूरेमें व्यक्ति एवं समाज के द्वन्द्व से उत्पन्न स्थितियों का चित्रण विभिन्न कथानकों के माध्यम से किया गया है। इनके नाटक शिल्प एवं रंगमंच की दृष्टि से भी अत्यन्त सफल सिद्ध हुए हैं।’’1
          ‘‘नाटक की कसौटी रंगमंच है। रंगमंच को नाटक का निष्कर्ष मानकर ही उसकी निजी सत्ता की खोज संभव है। नाट्यकृति और रंगमंच एक-दूसरे के कार्य और कारण है, दूसरे स्तर पर एक-दूसरे के पूरक यहाँ तक कि एक दूसरे के पर्याय भी। निर्विवाद रूप से यह सिद्ध होता है कि रंगमंच की आत्मा नाटकीयता है और नाटक की आत्मा रंगमंचीयता। भरतमुनि ने अपने नाट्यशास्त्रमें कहा है कि- नाटक का शरीर है वाचिक अभिनय, क्योंकि आंगिक और सात्विक अभिनय तथा नेपथ्य आदि सब उसी को व्यंजित करते हैं।’’2 स्वतंत्र भारत में नाटक की सबसे बड़ी उपलब्धि उसकी रंगमचीयता की ओर अग्रसर होना है, जोकि स्वतंत्रता पूर्व के या प्रसादयुगीन नाटक की कमी रही है, लेकिन स्वातन्त्रोत्तर नाटकों में रंगमंचीयता का स्पष्ट विकास परिलक्षित होता है, जिसके सम्बन्ध में डॉ. नरनारायण राय का कहना है कि- ‘‘स्वतंत्र भारत में नाटक की सबसे बड़ी उपलब्धि उसकी रंगमंचीयता की ओर अग्रसर होना है अथवा यों कहें की दृश्यकाव्य के रूप में नाटक की दृश्यत्व की ओर ले जाकर उसे वास्तविक रूप में सार्थकता प्रदान करना है। जगदीशचन्द्र माथुर के नाटक कोणार्कमें पहली बार यह सन्नाटा टूटा था, अंधायुगने एक और झटका दिया तथा मोहन राकेश ने सन्नाटे के तार-तार बिखेर डाले। यदि हिन्दी रंगमंच पर प्रदर्शनमूलक गतिविधियों में बढ़ोत्तरी आयी, दर्शक वर्ग तैयार हुआ, साहित्यिक नाटक भी प्रदर्शनों में लोकप्रियता की ओर अग्रसर हुए तो इसमें अधिकांश योगदान मोहन राकेश का ही रहा है।’’3
          उपरोक्त उदाहरण से स्पष्ट हो जाता है कि स्वतन्त्रता के पूर्व हिन्दी नाटकों में रंगमंच के सन्नाटे को किस प्रकार स्वातन्त्रोत्तर नाटकों में तोड़कर उसे रंगमंच के निकष पर खरा उतारा गया, यह बदलाव ही हमें समकालीन जीवन के यर्थाथ का दर्शन कराते हैं।
          मोहन राकेश के नाटक पाठकों का जितना मनोरंजन करते है, मंच पर भी उसी सफलता के साथ अभिनीत होते हैं। इसी का परिणाम है कि उनके नाटक आषाढ का एक दिन’, ‘लहरों के राजहंसअनेक बार नाट्य संस्थाओं द्वारा रंगमंच पर अभिनीत हो चुके हैं। इन नाटकों के सफल मंचन के बाद मोहन राकेश के आधे-अधूरेके मंचन ने उन्हें शिखर पर पहुँचा दिया। जिसके सम्बन्ध में सुरेन्द्र यादव के मत स्पष्ट है कि ‘‘हिन्दी नाटक में एक अकेला नाम मोहन राकेश का उभरता है जिन्होंने एक सशस्त विधा तथा हिन्दी रंगमंच को एक सार्थक माध्यम के रूप में जीवंत पहचान दी।’’4
          ‘आधे-अधूरेनाटक यथार्थवादी रंगशिल्प का सफल उदाहरण है, इसे समझने से पहले हमें रंगशिल्प के बारे में समझ लेना आवश्यक है, रंगशिल्प दो प्रकार के होते हैं यथार्थवादी तथा अयथार्थवादी। यथार्थवादी रंगशिल्प वह है जो जीवन, समाज, वर्ग आदि का स्पष्ट या हूबहू या ज्यों का त्यों चित्रण प्रस्तुत करता है इस प्रकार के रंगमंच के विकास या रंगशिल्प के विकास की परम्परा पाश्चात्य देशों से मानी जाती है। अयथार्थवादी रंगशिल्प  जीवन, समाज, वर्ग आदि का हूबहू चित्रण न करके उसका आभास कराते हैं या सांकेतिक चित्रण करतें हैं, जिसमें भाव और कल्पना का समावेश होता है, इस प्रकार के रंगशिल्प 'प्रसाद' के नाटकों में उपलब्ध होते हैं जैसे- 'चन्द्रगुप्त' में मौर्य वंश का चित्रण।'
          ‘आधे-अधूरेनाटक का रंगशिल्प रियलिष्टिक थियटरअर्थात् 'यथार्थवादी रंगमंच' के पूर्णतः अनुकूल है, क्योंकि इस नाटक में कमरे की स्थिति का हूबहू चित्रण है, जो इस प्रकार है- ‘‘ 'आधे-अधूरेका कार्य स्थल मकान का बैठने का कमरा है, जिसमें सोफे, कुर्सियाँ, मेजें, अलमारी, किताबें, फाइलें आदि हैं। यह कमरा एक समय साफ-सुथरा रहा होगा, पर सालों की आर्थिक कठिनाइयों के कारण अब सब पर धूल की तह जम गई है।’’5
          ‘‘सामान में कहीं एक तिपाई, कहीं दो-एक मोढ़े, कहीं फटी-पुरानी किताबों का एक शेल्फ और कहीं पढ़ने की एक मेज-कुर्सी भी है। गद्दे, परदे, मेजपोश और पलंगपोश अगर है, तो इस तरह घिसे, फटे या सिले हुए कि समझ में नहीं आता कि उनका न होना क्या होने से बेहतर नहीं था?’’6 इस उदाहरण से स्पष्ट होता है, कि हर-चीज का रिश्ता दूसरी चीज से टूटा होना, असुविधाओं में ही सुविधा खोजने की कोशिश, फटी-पुरानी किताबें, घिसे-फटे गद्दे, परदे, मेजपोश आदि वातारण में ऐसा बिम्ब प्रस्तुत करतें हैं, जो नाटक के परिवार की समस्त विसंगतियों और मजबूरियों को स्पष्ट करने के साथ पात्रों की स्थितियों को भी ध्वनित कर देते हैं । इस नाटक के पात्र भी असुविधा में सुविधा खोजने की तलाश में लगे हुए हैं। उनका आपस में रिश्ता टूट चुका है और वे गद्दे, परदे आदि की तरह ही घिस-पिट गये हैं। इसी सम्बन्ध में नाट्य समीक्षक जयदेव तनेजा का मत स्पष्ट है कि ‘‘जो कुछ भी है वह अपनी अपेक्षाओं के अनुसार न होकर कमरे की सीमाओं के अनुसार एक और ही अनुपात से है। एक चीज का दूसरी चीज से रिश्ता तत्कालीन सुविधा की माँग के कारण लगभग टूट चुका है।’’7
          ‘आधे-अधूरेनाटक को प्रस्तुत करने के लिए मोहन राकेश ने रंगमंचीय संरचना में यथार्थवादी शिल्प का कुशलता से प्रयोग किया है। एक ऐसा ढाँचा जो यह दर्शाता है कि इस मकान में कभी एक उच्च मध्यवर्गीय परिवार रहा करता था जिसकी आर्थिक दुर्दशा ने उसके आंतरिक तथा बाहरी दोनों ढाँचों को छिन्न-भिन्न कर दिया है। मोहन राकेश अपने नाटक में दिखाते हैं कि- ‘‘तो पता नहीं और क्या बर्वादी हुई होती। जो दो रोटी आज मिल जाती है मेरी नौकरी से वह भी न मिल पाती। लड़की भी घर में रहकर ही बुढ़ा जाती, पर यह न सोचा होता किसी ने कि...’’8
          मध्यवर्गीय परिवार की संवेदना को विस्तार देते हुए लेखक ने प्रत्येक पात्र की वेशभूषा का चित्रण निर्धारित किया है, वह भी यर्थाथवादी रंगशिल्प को बहुआयामी बनाता है- ‘‘पुरुष एक के रूप में वेशान्तर: पतलून-कमीज। जिन्दगी से अपनी लड़ाई हार चुकने की छटपटाहट लिए। पुरुष दो, दूसरे रूप में: पतलून और बन्द गले का कोट। अपने आप से सन्तुष्ट, फिर भी आशंकित। पुरुष-तीन के रूप में: पतलून, टी-शर्ट। हाथ में सिगरेट का डिब्बा। लगातार सिगरेट पीता। अपनी सुविधा के लिए जीने का दर्शन पूरे हाव-भाव में। पुरुष-चार के रूप में: पतलून के साथ पुरानी काट का लम्बा कोट। चेहरे पर बुजुर्ग होने का खारा अहसास का काइयाँपन।’’9 इस उदाहरण को कुछ लोग अनुपयोगी और अव्यावहारिक मानते हैं। किन्तु 'ओम शिवपुरी' ने 'काले सूट वाला आदमी' समेत चारों पुरुष की भूमिकाओं का बहुत ही सफलता से अभिनय कर इस तथ्य को गलत सिद्ध कर दिया है यह अवश्य कहा जा सकता है, कि साधारण अभिनेता शायद सफलता पूर्वक एक साथ पाँच पुरुषों की भूमिकाएँ न कर सके।
          इसी प्रकार ‘‘इक्कीस वर्षीय लड़के का अभिनय पतलून में भड़कीली शर्ट दबाए हुए आकर्षक लगता है। उसके चेहरे पर खास तरह की कड़वाहट झलकती है। स्त्री साधारण से साड़ी-ब्लाउज में, जिसके चेहरे पर यौवन की चमक और चाह, फिर भी शेष का प्रतिबिम्ब झलकता है, जिसका अभिनय दर्शक को मोह  लेता है। तीस वर्षीय लड़की 'बिन्नी' साधारण सुरुचिपूर्ण साड़ी-ब्लाउज में, जिससे व्यक्तित्व में बिखराव, अवसाद और उतावलेपन का प्रतिबिम्ब झलकता है। छोटी लड़की 'किन्नी' फ्रॉक और मोज़े पहने हुए, जिसके चेहरे पर चंचलता का हाव-भाव और मुखमुद्रा से संबंधित अभिनय बड़ा ही आकर्षक और रोचक है।’’10 इससे स्पष्ट हो जाता है कि नाटक के पात्रों की वेश-भूषा हमारे तत्कालीन जीवन से मिलती है जिसका यर्थाथ चित्रण नाटक मंचन में प्रस्तुत हुआ है इन्हीं कारणों से यथार्थवादी रंगशिल्प का सफल उदाहरण है आधे-अधूरे
          ध्वनि का भी रंगमंच की दृष्टि से विशेष महत्व है जो परोक्ष एवं नेपथ्य के माध्यम से ध्वनित होकर मंचीय प्रभाव को बढ़ा सकती है और दर्शक के मन में अमूर्त बिम्ब बनाकर नाट्य स्वाद को तीव्र कर सकती है या दर्शक के कौतूहल को तीव्र कर सकती है मोहन राकेश ने आषाढ़ का एक दिनमें बादलों के गर्जन का परोक्ष-ध्वनि के रूप में सफल प्रयोग किया है। ‘‘लहरों के राजहंस’’ में हंसो की ध्वनि का उपयोग किया है लेकिन 'आधे-अधूरे' में परोक्ष-ध्वनियों का व्यापक प्रयोग नहीं हुआ है जो हुआ है वह नेपथ्य से हुआ है जो इस प्रकार है- ‘‘अहाते के पीछे से दरवाजे की कुण्डी खटखटाने की आवाज, बाहर से ऐसा शब्द सुनाई देता है जैसे पाँव फिसल जाने से किसी ने दरवाजे का सहारा लेकर अपने को बचाया हो।’’11
          'आधे-अधूरे' नाटक में ध्वनि की तुलना में प्रकाश का प्रयोग लेखक ने अधिक किया है, जिससे मंच पर प्रकाश का प्रभाव दर्शक के मन को आकर्षित करता है, प्रकाश वृत्तों से, धीमे तथा तेज प्रकाश से, छाया तथा अन्धकार से मंच पर प्रभाव डाला गया है जो इस प्रकार है- ‘‘परदा उठने पर सबसे पहले चाय पीने के बाद डाइनिंग टेबल पर छोड़ा गया अधटूटा टी-सेट आलोकित होता है। फिर फटी किताबों और टूटी कुर्सियों आदि में से एक-एक। कुछ सेकण्ड बाद प्रकाश सोफे के उस भाग पर केन्द्रित हो जाता है, जहाँ बैठा काले सूटवाला आदमी सिगार के कश खींच रहा है उसके सामने रहते प्रकाश उसी तरह सीमित रहता है, पर बीच-बीच में कभी यह कोना और कभी वह कोना साथ आलोकित हो उठता है।’’12 इसी प्रकार प्रकाश का प्रयोग नाटक के बीच-बीच में होता रहता है और अन्त में प्रकाश का प्रयोग- ‘‘प्रकाश खण्डित होकर स्त्री और बड़ी लड़की तक सीमित रह जाता है। स्त्री स्थिर आँखों से बाहर की तरफ देखती आहिस्ता से कुर्सी पर बैठ जाती है।... उन दोनों पर भी प्रकाश मद्धिम पड़ने लगता है। तभी, लगभग अंधेरे में लड़के की बाँह थामें पुरुष एक की  धुंधली आकृति अन्दर आती दिखाई देती है।’’13
          ऊपर दिये गए विभिन्न मतों एवं विवेचनों से यह प्रमाणित हो जाता है कि रंगमंच एवं अभिनेयता की दृष्टि से आधे-अधूरेनाटक एक अत्यन्त सफल नाटक है। आज तक इसका अभिनय अनेक बार हो चुका है, यह भी इसी तथ्य का स्पष्ट परिचायक है। नाटककार ने जिस शिल्प तथा जिस तकनीक को यहाँ अपनाया है, वह एक प्रकार से सर्वथा नवीन है। आधुनिक रंगमंच एवं नाट्य-शिल्प की आवश्यकताओं के सर्वथा अनुरूप है। दृश्य-योजना का मंचीय या अभिनेय नाटकों में बहुत अधिक महत्व है। आधे-अधूरेनाटक की यह एक प्रमुख विशेषता है कि इसका समूचा दृश्य-विधान एक ही सैट पर किया गया है। मोहन राकेश ने दृश्य-विधान एक ही सैट पर किया है। राकेश ने दृश्य-विधान के समान ही एक ही पुरुष- पाँच द्वारा चार-पाँच भूमिकाएँ निभा ले जाने का भी एक नवीन प्रयोग किया है। एक ही पुरुष अभिनेता थोड़ी-सी वेश-भूषा के परिवर्तन के साथ चार-पाँच पात्रों का चुनौतीपूर्ण अभिनय कर जाता है। निश्चय ही मोहन राकेश की यह एक नव्यतम एवं अद्भुत उपलब्धि है।
          निष्कर्षतः हम कह सकते हैं कि आधे-अधूरेयथार्थवादी रंग शिल्प का सफल उदाहरण है चाहे वह मंच का वातावरण, वेश-भूषा एवं प्रकाश आदि हो सभी के प्रयोग से यथार्थवादी रंगशिल्प के निकष पर आधे-अधूरेमोहन राकेश का सर्वोत्कृष्ट नाटक है। आधे-अधूरे' की साधारण भाषा, वेश-भूषा, प्रकाश- योजना, कथ्य एवं संवाद हमारे समकालीन यथार्थवादी  जीवन का चित्रण करने में सफल हुए हैं इसीलिए आधे-अधूरेनाटक यथार्थवादी रंगशिल्प का सफल उदाहण है।  

संदर्भ सूची

1.      ‘‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’’- हृदयेश मिश्र एवं शिवलोचन पाण्डेय, पृष्ठ सं. 226, प्रकाशक-भारतीय भवन पटना, 2003
2.      ‘‘नाटककार मोहन राकेश’’- डॉ. स्वामी प्यारी कौड़ा, पृष्ठ सं. 111, प्रकाशक के.एच. पचौरी प्रकाशन, गाजियाबाद, 2008
3.      ‘‘रंगशिल्पी मोहन राकेश’’- डॉ. नरनारायण राय, पृष्ठ सं. 29
4.      ‘‘नाटक, रंगमंच और मोहन राकेश’’- डॉ. सुरेन्द यादव, पृष्ठ 267
5.      ‘‘आधे-अधूरे’’- मोहन राकेश, पृष्ठ सं. 11 प्रकाशक-राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 2009
6.      उपरोक्त, पृष्ठ सं. 16
7.      ‘‘मोहन राकेश रंगशिल्प और प्रदर्शन’’- जयदेव तनेजा, पृष्ठ सं. 225-226 प्रकाशक-राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली,1996
8.      ‘‘आधे-अधूरे’’- मोहन राकेश, पृष्ठ सं. 28
9.      उपरोक्त, पृष्ठ सं. 15
10.    ‘‘नाटककार मोहन राकेश’’- डॉ. स्वामी प्यारी कौड़ा, पृष्ठ सं. 275
11.    ‘‘आधे-अधूरे’’- मोहन राकेश, पृष्ठ सं. 99
12.    उपरोक्त, पृष्ठ सं. 16
13.    उपरोक्त, पृष्ठ सं. 99-100

शोध समीक्षा और मूल्याङ्कन अंतर्राष्ट्रीय रिसर्च जर्नल में प्रकाशित , फरवरी अंक, 2018
ISSN(P) : 0974-2832
ISSN(E) : 2320-5474 
RNI : RAJBIL2009/29954

Impact Factor : 5.901(SJIF)


ज्ञानेन्द्र प्रताप सिंह

शोधार्थी -हिंदी विभाग ,दिल्ली विश्वविद्यालय
पता – सी -195-196 द्वितीय तल, गाँधी विहार दिल्ली
पिन न. 110009मो. न.- 8882898773


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